ग्लोबल वार्मिंग पर कविताएं – Global Warming In Hindi Poem

Global Warming In Hindi Poem – ग्लोबल वार्मिंग पर कविताएं दोस्तों आज हम आपके साथ ग्लोबल वार्मिंग पर लिखी गई कविताएं शेयर कर रहे है Global Warming In Hindi Poem पर लिखी गई कविताएं सभी कक्षा और कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध कराई गई है. इन कविताओं को विद्यार्थी अपनी परीक्षा और प्रतियोगिताओं में काम में ले सकते है

Global Warming In Hindi Poem

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ग्लोबल वार्मिंग एक ऐसा विषय है अगर इस पर अभी ध्यान नहीं दिया गया तो यह है आगे जाकर पूरी पृथ्वी को समाप्त कर सकता है इसलिए हमने लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए कविताएं लिखी हैं जिनकी सहायता से लोगों का ध्यान आकर्षण करके उन्हें Global Warming के बारे में बताया है

(1) Global Warming In Hindi Poem – Nirmal Jheel jo Kabhi Thi Yhaan

निर्मल झील जो की कभी थी यहाँ
उसका पानी सूख गया कहां

पूछे तुमसे सारा ये जहां
कर सको तो करो अपने शब्दों से बयां

क्यों तू काटे शीतल छाया
कहां है वो पेड़ों का साया

जिसके नीचे था मैंने बचपन बिताया
कत्लेआम करके उसका तुमने क्या पाया

धुआ चारों ओर फैला
शुद्ध हवा का स्तर घटाया

बाढ़, तूफान, भूकंप को बढ़ाया
दुश्मन प्रकृति को तू ने ही बनाया

तापमान नहीं बढ़ा है इस धरती का
बढ़ा है तो रोष उसका हल्का सा

अपने मतलब के लिए जो तू ने है छीना
सूत समेत भुगतान है उसका अब भरना

अब भी वक्त है जाग जा ए इंसान
कर संपूर्ण मानव जाति का कल्याण

कहीं मिट ना जाए हमारा नामो निशान
लौटा दे प्रकृति को उसका खोया हुआ सम्मान


(2) Dekho Dekho Kaisa Kalyug Aaya – Global Warming Poem

देखो देखो कैसा कलयुग आया
कभी होती थी जहां पेड़ो की छाया
अब बची है सुखी और बंजर धरा

जहां बहती थी कल -कल करती नदिया
अब सुख गया नदियों का पानी
देखो देखो कैसा कलयुग आया

हमने दिए धरती माँ को इतने जख्म
की अब हर दिन बाढ़, तूफान और भूकंप आया
देखो देखो कैसा कलयुग आया

साँस लेना हो रहा दुर्भर
वन्य जीव हो रहा है विलुप्त
देखो देखो कैसा कलयुग आया

बढ़ रहा है तापमान, पिघल रहा ग्लेसियर
कही और नही मिलेगा ऐसा स्वच्छ वातावरण

क्यों कर रहा है अपनी मनमानी
सुधर जा ए मानव नहीं
वो दिन दूर नही जब प्रलय आया

– Narendra Verma


(3) Ek Prithvi Thi jani Si Anjani Si Poem in hindi

एक पृथ्वी थी जानी सी अनजानी सी
हरी भरी, फूलो से लदी
पानी उसका जीवन था

सुखी था उसका हर एक प्राणी
ना जाने कहा से आया मानव उसका दुश्मन
लेकर हथियार विज्ञानं का

बोला पृथ्वी से, कर दूंगा तुझे
और भी निर्मल और स्वच्छ
पृथ्वी यह सुनकर बहुत खुश हुयी

दे दिया सबकुछ अपना
उस मानव रूपी दानव को

वर्ष बीते सदियाँ बीती
अब आया लालच मानव को

उखाड़ दिए उसके हरे भरे जंगल
बो दिया बीज कल कारखानों का
कर दिया हर तरफ धुआं ही धुआं

बढ़ा दिया पृथ्वी का तापमान
बिगड़ गया पृथ्वी का संतुलन
यह देख पृथ्वी को आया क्रोध

ले आयी सुनामी, तूफान और भूकंप
लाखो जाने गयी फिर भी नही चेत
रहा है ये मानव रूपी प्राणी

– Narendra Verma


(4) Global Warming se Garmati Dharti Poem in hindi

ग्लोबल वार्मिंग गरमाती धरती
ग्लेशियर पिघल रहे घबराती धरती

वायुमंडल हो रहा सारा ही दूषित
उथल-पुथल है भीतर कहीं बाहर कहीं ग्रीन हाउस गैसों से बढ़ रहा खतरा

सभी की चाहत है मुस्कुराती धरती
मेवाड़ कहीं सूखा रंग दिखलाता

खून के आंसू भीतर बहाती धरती
सुनामी का तांडव कहीं निगल न जाए

बचा लो तटो को पाठ पढ़ाती धरती
अंधाधुंध न काटो बढ़ाओ वृक्षों को

पर्यावरण बचालो समझाती धरती


(5) Aao Sab Milkar Kuch Kaam Kare Poem in hindi

आओ सब मिलकर कुछ काम करे
पृथ्वी को बचाने में योगदान करे

जल बचाए, पेड़ लगाए, प्रदूषण हटाए
आओ सब मिलकर कुछ श्रमदान करे

ओजोन परत हो रही है पतली
सूरज की किरणें भेद रही है धरती का सीना

बढ़ रहा है धरती का पारा
जीवो के जीवन पर है छाया संकट गहरा

पिघल रहा है धरती का ताज हिमालय हमारा
बढ़ रही है विपदा सुनामी और भूकंप की

बढ़ रहा है ग्लोबल वार्मिंग का खतरा
कहीं सूखा तो कहीं बढ़ रहा है बाढ़ का खतरा

आओ सब मिलकर बचाएं अपनी धरती मां को
आओ सब मिलकर कुछ काम करे

– Narendra verma


(6) Phir Bhi Nhi Chet Rhai Hai Ye Manav – Global Warming In Hindi Poem

फिर भी नहीं चेत रहा है ये मानव
घुट घुट कर जी रहा है जीवन

छेद दिया धरती का सीना
निकाल लिया पानी, सुखा दिया धरती को

जंगलों को ऐसे काटा, बचा नही एक भी पेड़
बदल गया पूरा हरा भरा जंगल, हो गया मरुस्थल

छीन लिया जंगली प्राणियों का घर
बना दी बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां, कर दिया प्रदूषण

मानव ने अपने जीवन को ऐसे जिया
कि जीवन देने वाली धरती को ही उजाड़ दिया

हाहाकार मचा चहु और ग्लोबल वॉर्मिंग का खतरा जो मंडराया है
सूख गए नदी और तालाब, बारिश का नामो निशान नहीं

आसमान में प्रदूषण के काले बादल है छाए
बरसा रहे है नित नई बीमारियाँ

कहीं सुनामी, कहीं भूकंप, पृथ्वी ने भी चेताया है
सांस लेना हो रहा है मुश्किल फिर भी नहीं चेत रहा मानव

– Narendra verma


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