Chipko Andolan in Hindi | चिपको आंदोलन

Chipko Andolan in Hindi : उत्तराखंड के चमोली जिले में पेड़ों को कटने से बचाने के लिए साल 1974 में चिपको आंदोलन की शुरुआत हुई थी Chipko Andolan की शुरुआत गोरा देवी, चंडी प्रसाद भट्ट, सुंदरलाल बहुगुणा के नेतृत्व में हुई थी. जिसने ठेकेदारों से पेड़ों को बचाने के लिए आंदोलन की शुरुआत की थी. उत्तराखंड अपनी असीम सुदंरता और प्रकृति के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है.

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Chipko Andolan in Hindi (चिपको आंदोलन)

आंदोलन की शुरुआत26 मार्च 1974
नेतृत्वगोरा देवी
चंडी प्रसाद भट्ट
सुंदरलाल बहुगुणा
आंदोलन का स्थानरैणी गांव (उत्तराखंड)

वही इस सुंदरता में चार चांद लगाने वाले पेड़ों और जंगलों को काटने के लिए हाथ आगे बढ़े तो उत्तराखंड की महिलाओं ने अपनी जान की बाजी लगाकर जंगलों की रक्षा के लिए 26 मार्च 1974 को एक आंदोलन की शुरुआत की जिसे चिपको आंदोलन के नाम से जाना गया छोटे से राज्य से शुरू हुए इस आंदोलन को आज पूरे विश्व में पहचान मिल चुकी है इस आंदोलन को शुरू हुई करीब 45 साल गुजर गए हैं

‘चिपको आन्दोलन’ का घोषवाक्य है-

क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार।
मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार।


चिपको आन्दोनल का पुराना इतिहास (History of Chipko Andolan)

चिपको आन्दोनल का पुराना इतिहास राजस्थान से जुड़ा हुआ है. 1973 में अजीत सिंह के आदेश पर काटे जा रहे हैं खेजड़ी वृक्ष को बचाने के लिए अमृता देवी विश्नोई एवं उनकी तीन पुत्रियों ने पेड़ों से चिपक कर उसका विरोध किया था परंतु अभी सिंह के लोगों द्वारा 363 लोगों को वर्करों के साथ काट डाला गया.


चिपको आंदोलन के पीछे की कहानी (The Story Behind the Chipko Movement)

भारत में 1927 में वन अधिनियम को लागू किया गया था लेकिन इस अधिनियम में कई खामियां थी. इस अधिनियम के प्रावधान जंगलों में रहने वाले आदिवासियों के खिलाफ थे और इस प्रावधान के तहत प्राइवेट कंपनियां जंगलों में पेड़ों की कटाई कर सकती थी और हुआ भी वही प्राइवेट कंपनियां पहाड़ों के जंगलों में अंधाधुन कटाई करने लगी यह देख वहां के ग्रामीणों पर गहरा प्रभाव पड़ा.

उन्होंने इसके खिलाफ 1930 में टिहरी गांव में एक बड़ी रैली का आयोजन किया. लेकिन यह आंदोलन छोटे रूप में ही किया गया. 1961 में महात्मा गांधी की शिष्या सरला बहन ने इस आंदोलन को एक नई दिशा दी थी.

इस जन चेतना के कारण 1968 में बड़ी संख्या में आदिवासी पुरुष और महिलाएं इस पर्यावरण संरक्षण मुहिम के साथ जुड़ गए थे इन्हीं छोटे-छोटे आंदोलनों के कारण विश्वव्यापी चिपको आंदोलन की शुरुआत हुई थी.

लेकिन पेड़ों की अंधाधुंध कटाई को लेकर वहां के ग्रामीण परेशान हो गए और उन्होंने 1970 में एक बड़े आंदोलन का ऐलान किया जिसका बाद में नाम चिपको आंदोलन पड़ा.


चिपको आन्दोनल की शुरुआत क्यों हुई (Why did Chipko Andolan begin?)

1974 में वन विभाग ने पहाड़ों में रैणी गांव के जंगलों को कटाई के लिए नीलाम कर दिया था. इसके तहत करीब 2500 पेड़ों को काटा जाना था. लेकिन इसके खिलाफ महिलाओं ने एक रैली निकाली जिसका नेतृत्व गौरा देवी ने किया था.

उस समय वहां पर सड़क निर्माण भी हुआ था जिसके कारण काफी पेड़ काटे गए थे और वहां के ग्रामीणों को काफी नुकसान हुआ था इसकी भरपाई के लिए प्रशासन ने मुआवजा देने की बात रखी और मुआवजा देने के लिए 26 तारीख निश्चित की गई.

जिसको लेने के लिए वहां की सभी ग्रामीणों को चमोली आना था. लेकिन इसके पीछे एक बहुत बड़ा षड्यंत्र था गांव वालों को चमोली इसलिए बुलाया गया था कि पीछे से ठेकेदारों को वहां के जंगलों को काटने का मौका मिल जाए.

उस समय लोगों में एक चेतना पैदा हुई थी क्योंकि सरकार कहती थी की क्या है जंगल के उपकार  रेशा, लकड़ी और व्यापार लेकिन चिपको आंदोलन में वह सोच बदल दी है उसने कहा क्या है जंगल के उपकार मिट्टी पानी और बयार.

Chandi Prasad Bhatt, Gaura Devi, Sundarlal Bahuguna

रैणी गांव की सभी पुरुष मुआवजा लेने के लिए चमोली चले गए थे. फिर पीछे से ठेकेदारों के कहने पर वहां पर श्रमिक आ गए और पेड़ों को काटने के लिए बढ़ने लगे. पेड़ों को काटने आए लोगों को एक छोटी बच्ची ने देख लिया था उसने यह बात तुरंत गौरा देवी को बताई.

गौरा देवी ने तुरंत वहां की महिलाओं और बच्चों को लेकर पेड़ों को बचाने के लिए जंगलों की तरफ बढ़ गई और वहां पहुंच कर उन्होंने ठेकेदारों से गुहार लगाई कि वह पेड़ों को नहीं काटे.

लेकिन वहां के ठेकेदार नहीं माने और उन को डराने धमकाने लगे. गौरा देवी भी डरने वालों में से नहीं थी वह एक साहसी महिला थी उसने सभी महिलाओं और बच्चों को साथ लिया और वहां के पैरों से चिपक गई.

यह देखकर वह ठेकादार घबरा गए और वहां से चले गए. क्योंकि महिलाएं और बच्चे पेड़ों को बचाने के लिए उनसे लिपट गए थे इसीलिए इस आंदोलन का नाम Chipko Andolan रखा गया.


चिपको आंदोलन का प्रभाव (Impact of the Chipko Movement)

1974 के इस चिपको आंदोलन को इतनी ख्याति मिली कि यह देश और विदेशों में भी चर्चा होने लगी थी. इसके कारण वन संरक्षण अधिनियम में बदलाव किया गया और केंद्र सरकार द्वारा पर्यावरण मंत्रालय का भी गठन किया गया.

उत्तर प्रदेश (वर्तमान में उत्तराखंड) इस आंदोलन को 1980 में तब एक बड़ी जीत हासिल हुई जब भारत की तत्काल प्रधानमंत्री जी ने हिमालयी क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए 15 वर्षों तक दिलों की कटाई और पहाड़ों के खनन पर रोक लगा दी थी.


चिपको आन्दोनल में गौरा देवी की भूमिका (Role of Gaura Devi in ​​Chipko Andolan)

चमोली जिले के रैणी गांव में रहने वाली गौरा देवी जंगलों की सुरक्षा के लिए एक ऐसा कदम उठाया जो बाद में इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया. साल 1970 के दशक में जब भारत में जंगलों को बचाने के लिए ग्रामीण पेड़ों की कटाई का शांति से विरोध कर रहे थे.

उसी समय रैणी गांव की गौरा देवी ने अपने साथी 21 महिलाओं के साथ मिलकर पेड़ों से चिपक कर पेड़ों की रक्षा की और महात्मा गांधी के अहिंसा आंदोलन के पथ पर चलकर बाद में इस पहल को चिपको आंदोलन के रूप में ख्याति दिलाई थी.

उस समय गौरा देवी ने जंगल काटने वालों से कहा था जंगल हमारा मायका है इससे हमें जड़ी बूटी सब्जी फल को लकड़ी मिलती है जंगल काटोगे तो बाढ़ आएगी हमारे घर बह जाएंगे उस वक्त गोरा के जज्बे के आगे ठेकेदार तो भाग गए.


चिपको आन्दोनल में सुंदरलाल बहुगुणा की भूमिका (Role of Sundar Lal Bahuguna in ​​Chipko Andolan)

सुंदरलाल बहुगुणा के नेतृत्व में ही चिपको आन्दोनल की शुरुवात हुई थी. सुंदरलाल बहुगुणा ने गांव गांव जाकर पर्यावरण के प्रति जागरूकता लाने के लिए 1981 से 1983 तक ट्रांस हिमालय पदयात्रा की थी उन्होंने इस आंदोलन की शुरुआत टिहरी गांव से की थी.

उन्होंने पर्यावरण की सुरक्षा के लिए समय-समय पर कई आंदोलन किए हैं जैसे कि उन्होंने 1981 में हिमालय क्षेत्रों में हो रही अंधाधुन पेड़ों की कटाई को रोकने के लिए वह आमरण अनशन पर बैठ गए थे. अंत में सरकार ने जंगलों को काटने पर 15 सालों के लिए पाबंदी लगा दी थी.

सुंदरलाल बहुगुणा का जन्म 9 जनवरी 1928 को उत्तराखंड सिलयारा गांव में हुआ था उन्हें बहुचर्चित चिपको आंदोलन का जनक भी कहा जाता है इस आंदोलन के कारण वह “वृक्षमित्र” के नाम से मशहूर हुए साथ ही उन्हें “पर्यावरण गांधी” भी कहा जाने लगा.

पर्यावरण को बचाने के लिए उनके द्वारा किए गए प्रयासों को सरकार ने सराहा और 26 जनवरी 2009 को पदम विभूषण से सम्मानित किया. उन्हें वर्ष 1981 में पदम श्री से सम्मानित करने की घोषणा हुई लेकिन उन्होंने यह सामान लेने से इंकार कर दिया था.


चिपको आंदोलन की प्रमुख बातें (Key Points of the Chipko Movement)

1) चिपको आंदोलन का संबंध पर्यावरण संरक्षण से है और उद्देश्य वनों की कटाई नहीं करना और पर्यावरण को बचाना है

2) यह आंदोलन 26 मार्च 1974 को उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जनपद में ग्रामीण में महिलाओं द्वारा चलाया गया है.

3) इस आंदोलन का प्रमुख उद्देश्य व्यवसाय हेतु वनों की कटाई को रोकना था.

4) टिहरी गढ़वाल का नवजीवन आश्रम इस आंदोलन का प्रमुख केंद्र था.

5) चिपको आंदोलन का प्रारंभ राजस्थान के खेजड़ी गांव से प्रारंभ हुआ था

6) चिपको आंदोलन की शुरुआत 26 मार्च 1974 को प्रखंड के रैणी गांव जंगल के लगभग 25 शहरों की कटाई की नीलामी थी गौरा देवी एवं अन्य 21 महिलाओं ने नीलामी का विरोध किया और सफलता अर्जित की

7) इस आंदोलन के जनक गोरा देवी, चंडी प्रसाद भट्ट, सुंदरलाल बहुगुणा तथा अन्य कार्यकर्ताओं में मुख्यतः ग्रामीण महिलाएं थी

8) भारत सरकार ने अमृता देवी के नाम पर अमृता देवी विश्नोई वन्यजीव संरक्षण पुरस्कार प्रारंभ किया है

9) Chipko Movement के तहत तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने 1980 में हिमालयी वनों में वृक्षों की कटाई के लिए रोक लगा दी थी.

10) सन 1987 में इस आन्दोलन को सम्यक जीविका पुरस्कार (Right Livelihood Award) से सम्मानित किया गया था।

11) बाद के वर्षों में यह आन्दोलन पूर्व में बिहार, पश्चिम में राजस्थान, उत्तर में हिमाचल प्रदेश, दक्षिण में कर्नाटक और मध्य भारत फ़ैल गया था.


चिपको आंदोलन के बाद वर्तमान स्थिति (Current Situation after the Chipko Andolan)

Chipko Movement के बाद लोगो की सोच तो बच गई लेकिन उत्तराखंड का भूमि उपयोग नहीं बदला व्यापारियों ने वहां चीड़ के पेड़ लगा दिए और चीड़ के पेड़ मिट्टी और पानी  दोनों के लिए ही खराब होते हैं क्योंकि चीड़ के पेड़ की पत्तियां मिट्टी को खराब कर देती हैं/

और भूमिगत जल को चीड़ के पेड़ सुखा देते हैं चिपको आंदोलन का जो दूसरा पड़ाव था उत्तराखंड का भूमि उपयोग बदलना वह पूरा नहीं हो सका.

गांव की महिला मंगल दल की प्रमुख गोरा देवी के नेतृत्व में महिलाएं और बच्चे जंगल बचाने के लिए निकल पड़े गोरा का कहना था कि जंगल ही उसका मायका है उन्होंने लकड़हारों से कहा कि वह उनके पेड़ों को न काटे लेकिन जब पेड़ काटने आए ठेकेदार गांव वालों को धमकाने लगे/

गोरा देवी और उनकी सहेलियां पेड़ों से चिपक गई और गौरा देवी का यह प्रयास बन गया दुनिया में अपनी तरह के अनोखा चिपको आंदोलन की शुरुवात की.

उस समय गोरा देवी ने जंगल काटने वालों से कहा था जंगल हमारा मायका है इससे हमें जड़ी बूटी सब्जी फल को लकड़ी मिलती है जंगल काटोगे तो बाढ़ आएगी हमारे घर बह जाएंगे उस वक्त गोरा के जज्बे के आगे ठेकेदार तो भाग गए लेकिन गोरा की सोच को भुला गए और वही हुआ जिसका गोरा को डर था.

आज गांव रैणी खुद खतरे में है क्योंकि आज गांव के पहाड़ों को खोदकर हजारों पेड़ काट दिए गए हैं और तो और इस क्रांति पर गांव में हरे भरे पेड़ों को काटकर आज एक पावर प्लांट ने ले ली है यह इंसानी फितरत ही है कि गोरा देवी आज सिर्फ कुछ चंद कागजों में ही जिंदा है.


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